लेखक:सैय्यद हुसैन महदी अमसिन
हौज़ा न्यूज़ एजेंसी! कुछ लोग तारीख़ का हिस्सा बनते हैं और कुछ लोग तारीख़ के सवाल बन जाते हैं। कुछ लोग वक़्त के साथ गुज़र जाते हैं, मगर कुछ ऐसी आवाज़ें छोड़ जाते हैं जो वक़्त गुज़रने के बाद भी ख़ामोश नहीं होतीं। उनका जिस्म ख़ाक में उतर जाता है, लेकिन उनका फ़िक्र, उनका किरदार और उनके दौर की गवाही आने वाली नस्लों के ज़मीर को झकझोरती रहती है। शहीद सैयद हसन नसरुल्लाहؒ भी ऐसी ही शख़्सियतों में शुमार होते हैं, जिनकी ज़िंदगी और शहादत ने अपने दौर के सामने हक़, ज़ुल्म, इज़्ज़त, आज़ादी, वफ़ा और क़ुर्बानी के ऐसे सवाल रखे जो महज़ एक इलाक़े या एक क़ौम तक महदूद नहीं रहते, बल्कि इंसानी ज़मीर से मुख़ातिब होते हैं।
27 सितंबर 2026 को 2024 के उस हमले की दूसरी बरसी पूरी होती है जिसमें सैयद हसन नसरुल्लाहؒ की शहादत हुई थी। उनकी शहादत की आधिकारिक पुष्टि 28 सितंबर 2024 को हुई थी। दो साल गुज़र गए, लेकिन कुछ शहादतें सिर्फ़ कैलेंडर की तारीख़ नहीं बनतीं; वे तारीख़ के सीने पर एक निशान बन जाती हैं और आने वाली नस्लों के लिए अपने दौर के हालात, फ़ैसलों और किरदार का मुतालआ करने का एक हवाला बनती हैं।
सैयद हसन नसरुल्लाहؒ को समझने के लिए उन्हें सिर्फ़ एक सियासी रहनुमा, किसी तंज़ीम के सरबराह या एक मिलिट्री कमांडर के तौर पर देखना काफ़ी नहीं है। उनकी तक़रीरों और उनके सार्वजनिक ख़िताबों में बार-बार कर्बला, आशूरा, इमाम हुसैनؑ, करामत, सब्र, वफ़ादारी, क़ुर्बानी और मज़लूम की हिमायत जैसे मज़ामीन सामने आते रहे। यही वह मुक़ाम है जहाँ उनकी शख़्सियत का एक अहम पहलू मक्तब-ए-हुसैनी से जुड़ता दिखाई देता है। कर्बला उनके लिए महज़ एक तारीख़ी वाक़िआ नहीं थी, बल्कि एक ऐसी फ़िक्र थी जिसमें इंसान को यह सिखाया जाता है कि हालात चाहे कितने ही मुश्किल क्यों न हों, हक़ और बातिल के फ़र्क़ को मिटाया नहीं जा सकता।
क़ुरआन कहता है:
وَلَا تَهِنُوا وَلَا تَحْزَنُوا وَأَنْتُمُ الْأَعْلَوْنَ إِنْ كُنْتُمْ مُؤْمِنِينَ
“और कमज़ोर न पड़ो और ग़म न करो, अगर तुम मोमिन हो तो तुम ही सरफ़राज़ रहोगे।”
कर्बला इसी क़ुरआनी रूह की एक अज़ीम तफ़्सीर है। वहाँ तादाद कम थी, सामान कम था और सामने एक बहुत बड़ा लश्कर था, लेकिन इमाम हुसैनؑ ने हक़ को तादाद के तराज़ू पर नहीं तौला। कर्बला ने इंसानियत को यह सिखाया कि हक़ की क़ीमत उसके साथ खड़े लोगों की तादाद से नहीं होती। कभी-कभी एक इंसान का इस्तिक़ामत से खड़ा होना पूरी तारीख़ पर भारी पड़ जाता है।
इसीलिए कर्बला सिर्फ़ एक वाक़िआ नहीं, एक मक्तब है। यह वह मक्तब है जहाँ अली अकबरؑ की जवानी क़ुर्बान होती है, अब्बासؑ की वफ़ा अपना कमाल दिखाती है, क़ासिमؑ की कमसिनी शहादत का लिबास पहनती है, हबीब इब्ने मज़ाहिरؑ उम्र के आख़िरी हिस्से में भी हक़ का साथ नहीं छोड़ते और ज़ुहैर इब्ने क़ैनؑ अपना रास्ता बदलकर हुसैनؑ के क़ाफ़िले में शामिल हो जाते हैं। इन सबके दरमियान एक ही रिश्ता है—हक़ के साथ वफ़ादारी और बातिल के सामने झुकने से इनकार।
कर्बला का सबसे बड़ा पैग़ाम यही है कि इंसान अपने ज़मीर को किसी दुनियावी ताक़त के हवाले न करे। इमाम हुसैनؑ की पुकार, “हैहात मिन्नज़-ज़िल्लह”, यानी ज़िल्लत हमसे दूर है, सिर्फ़ एक नारा नहीं बल्कि इंसानी करामत और आज़ादी-ए-ज़मीर की एक ऐसी आवाज़ है जिसने सदियों से मज़लूम इंसान को यह एहसास दिलाया है कि ज़िंदगी की असली क़ीमत सिर्फ़ ज़िंदा रहने में नहीं, बल्कि इज़्ज़त के साथ ज़िंदा रहने में है।
क़ुरआन ने भी अहल-ए-ईमान की ज़िंदगी को इसी एहद से जोड़ा है:
إِنَّ اللَّهَ اشْتَرَىٰ مِنَ الْمُؤْمِنِينَ أَنْفُسَهُمْ وَأَمْوَالَهُمْ بِأَنَّ لَهُمُ الْجَنَّةَ
“बेशक अल्लाह ने मोमिनों से उनकी जानें और उनके माल ख़रीद लिए हैं और उनके बदले उनके लिए जन्नत है।”
कर्बला में इस आयत की रूह अपने सबसे बुलंद अंदाज़ में नज़र आती है। वहाँ जान भी पेश हुई, माल भी पेश हुआ, औलाद भी पेश हुई और आख़िरकार पूरा ख़ानदान-ए-रसालत अपने ख़ून से तारीख़ के माथे पर यह लिख गया कि हक़ की राह में क़ुर्बानी सिर्फ़ लफ़्ज़ नहीं, एक अमल है।
सैयद हसन नसरुल्लाहؒ की शहादत को भी इसी व्यापक कर्बलाई फ़िक्र के आईने में पढ़ा जा सकता है। उनकी सियासी ज़िंदगी और उनकी नीतियों के बारे में अलग-अलग लोगों और विभिन्न राजनीतिक पक्षों की अलग-अलग व्याख्याएँ रही हैं, लेकिन यह बात उनकी सार्वजनिक तक़रीरों और बयानों के अध्ययन से स्पष्ट होती है कि कर्बला और इमाम हुसैनؑ की याद उनके ख़िताबी और वैचारिक शब्दकोश का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रही।
आयतुल्लाह अली अल-सिस्तानी के दफ़्तर की ओर से 28 सितंबर 2024 को जारी ताज़ियत के बयान में भी सैयद हसन नसरुल्लाहؒ की शहादत पर गहरे दुःख का इज़हार किया गया और क़ुरआन की आयत “مِنَ الْمُؤْمِنِينَ رِجَالٌ صَدَقُوا مَا عَاهَدُوا اللَّهَ عَلَيْهِ” पेश की गई। इस बयान में उनकी सार्वजनिक भूमिका और लेबनान तथा क्षेत्र के विभिन्न संघर्षों के संदर्भ में उनके योगदान का भी उल्लेख किया गया। यह बयान इस बात की भी याद दिलाता है कि उनकी शख़्सियत को समझने के लिए सिर्फ़ राजनीतिक घटनाओं को नहीं, बल्कि उस धार्मिक और सामाजिक संदर्भ को भी देखना ज़रूरी है जिसमें वे दशकों तक सक्रिय रहे।
कर्बला का रिश्ता सिर्फ़ तलवार और मैदान से नहीं है। कर्बला का एक पहलू ज़बान भी है, एक पहलू सब्र भी है, एक पहलू शुजाअत भी है और एक पहलू ज़मीर की हिफ़ाज़त भी है। ज़ैनब-ए-कुबराؑ ने कर्बला के बाद जो किरदार अदा किया, उसने साबित किया कि मज़ाहमत सिर्फ़ मैदान में खड़े होने का नाम नहीं। कभी हक़ की हिफ़ाज़त तलवार से होती है और कभी शब्दों से। कभी इंसान अपने ख़ून से गवाही देता है और कभी अपनी आवाज़ से।
इसीलिए मक्तब-ए-हुसैनी की मज़ाहमत को केवल जंग के अर्थ में समझना उसके व्यापक पैग़ाम को सीमित कर देना है। ज़ुल्म के सामने सच कहना भी मज़ाहमत है, मज़लूम की आवाज़ सुनना भी मज़ाहमत है, अपने ज़मीर को बिकने से बचाना भी मज़ाहमत है, अपने नफ़्स के ख़िलाफ़ खड़ा होना भी मज़ाहमत है और उस वक़्त हक़ की गवाही देना भी मज़ाहमत है जब ख़ामोशी इंसान के लिए आसान रास्ता बन चुकी हो।
क़ुरआन कहता है:
وَلَا تَرْكَنُوا إِلَى الَّذِينَ ظَلَمُوا فَتَمَسَّكُمُ النَّارُ
“और उन लोगों की तरफ़ बिल्कुल न झुकना जिन्होंने ज़ुल्म किया, वरना तुम्हें भी आग आ पहुँचेगी।”
कर्बला का मक्तब इंसान को इसी बुनियादी सवाल के सामने खड़ा करता है कि वह अपनी ज़िंदगी में किस तरफ़ खड़ा है। ज़ुल्म करने वाले के साथ या मज़लूम के साथ? सच के साथ या मफ़ाद के साथ? ज़मीर के साथ या ख़ामोश समझौते के साथ? यही वह सवाल है जो चौदह सदियों पहले कर्बला में मौजूद था और यही सवाल आज भी अलग-अलग शक्लों में इंसान के सामने मौजूद है।
वक़्त बदलता है, हुकूमतें बदलती हैं, सरहदें बदलती हैं, सियासी नक़्शे बदलते हैं, मगर इंसान और ज़ुल्म के बीच का बुनियादी रिश्ता नहीं बदलता। इसी वजह से कर्बला हर दौर में नए अर्थों के साथ सामने आती है। हर दौर का इंसान अपने हालात के आईने में कर्बला को देखता है और अपने ज़मीर से सवाल करता है कि अगर हुसैनؑ आज हमारे सामने होते तो हम अपने किरदार की कौन-सी गवाही पेश करते।
शहीद सैयद हसन नसरुल्लाहؒ की याद भी इसी सवाल से जुड़ती है। किसी भी शख़्सियत को समझने का सबसे सही रास्ता यह है कि उसके दौर, उसके बयानों, उसके फैसलों और उसके किरदार को उसके ऐतिहासिक संदर्भ में पढ़ा जाए। लेकिन एक बात अपनी जगह बिल्कुल साफ़ है कि कर्बला की रूह किसी एक शख़्सियत की मिल्कियत नहीं। इमाम हुसैनؑ का मक्तब किसी एक संगठन, किसी एक मुल्क या किसी एक दौर तक महदूद नहीं। यह हक़, इंसाफ़, करामत, वफ़ा और क़ुर्बानी का वह पैग़ाम है जो हर दौर के इंसान से मुख़ातिब होता है।
इसलिए सैयद हसन नसरुल्लाहؒ की शहादत को याद करते हुए असल मरकज़ किसी इंसान की शख़्सियत नहीं, बल्कि वह मक्तब होना चाहिए जिसकी तरफ़ उन्होंने अपनी तक़रीरों में बार-बार इशारा किया—मक्तब-ए-हुसैनؑ। क्योंकि हमारी पहली पहचान किसी शख़्सियत से नहीं, हक़ से है; हमारी पहली वफ़ादारी किसी दुनियावी ताक़त से नहीं, अल्लाह से है; और हमारी सबसे बड़ी दरगाह वह कर्बला है जहाँ इमाम हुसैनؑ ने अपने ख़ून से इंसानियत के ज़मीर को ज़िंदा कर दिया।
कर्बला हमें यह सिखाती है कि हक़ का रास्ता हमेशा आसान नहीं होता, लेकिन मुश्किल होने की वजह से हक़, हक़ नहीं रह जाता। कभी रास्ता तन्हाई का होता है, कभी कुर्बानी का, कभी सब्र का और कभी अपनी पूरी ज़िंदगी को एक मक़सद के लिए वक़्फ़ करने का। यही वह रूह है जो आशूरा को सदियों के बाद भी ज़िंदा रखती है और यही वह रूह है जिसकी वजह से कर्बला आज भी सिर्फ़ अतीत नहीं, बल्कि ज़िंदा एहसास है।
सैयद हसन नसरुल्लाहؒ की शहादत की याद हमें सिर्फ़ एक शख़्सियत की याद तक महदूद नहीं करनी चाहिए। यह याद हमें अपने दौर के ज़ुल्म, इंसाफ़, इंसानी करामत, मज़लूमों की हालत और अपने व्यक्तिगत किरदार पर भी ग़ौर करने की दावत देती है। अगर कर्बला हमारे दिल में है तो उसका असर हमारे किरदार में भी दिखाई देना चाहिए। अगर हम हुसैनؑ का नाम लेते हैं तो हमारे अंदर सच बोलने की हिम्मत, ज़ुल्म से दूरी, मज़लूम के लिए दर्द और अपने नफ़्स के ख़िलाफ़ जिहाद की रूह भी पैदा होनी चाहिए।
यही कर्बला की ज़िंदगी है। यही मक्तब-ए-हुसैनؑ की रूह है। और यही वह पैग़ाम है जो किसी एक तारीख़ के ख़त्म हो जाने से ख़त्म नहीं होता।
कर्बला ज़िंदा है, क्योंकि हुसैनؑ का पैग़ाम ज़िंदा है। और जब तक इंसान के अंदर हक़ को पहचानने वाला ज़मीर, ज़ुल्म के सामने झुकने से इनकार करने वाली रूह और इंसाफ़ के लिए क़ुर्बानी देने का हौसला मौजूद है, मक्तब-ए-हुसैनؑ की आवाज़ ख़ामोश नहीं हो सकती।
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